May 29, 2022

Zerogravity

Collaborate Learn Innovate

Ishwar Sarade’s Poetry

Husn

ना वज़ह तुम बेवज़ह
बेवफा तुम हो गए
जिस्म हम तोह भूल गए
वो हुस्न अब भी याद है

बात यह बेबाक है
और साथ में ही पाक है की
हुस्न तुम्हारा साद सा
आज मेरा साथ है

रोशनी और नूर तुम्हारा
आफ़ताब का ख्वाब है
प्यार महब्बत इश्क़ हमारा
हुस्न तुम्हारा ताज है

मुकद्दर के तलाश में
हम काफिले संग चल पड़े
दीदार-ए-हुस्न हुआ आपका
मंजिल से रूबरू हो गए


Saazish

इन लहरों के आहट में
तुम्हारी आदत है
नजदीक तो आती है
फिर दूर चली जाती है

तारो तले बैठा हूँ
एक मैं हूँ और एक समंदर
कितने अरमान दबा रखा हूँ
मैं दिल के अंदर

साथ है तन्हाई
और तुम्हारी कमी है
लहरे छू रही कदमो को
पर गायब वो नमी है

ख़तम कर लू तन्हाई
ज़ारी मेरी कोशिश है
तुम्हे मैं यहां ले आउ
बस यही मेरी साजिश है


Kisi Dusre Ke Kahne Par

किसी दूसरे के कहने पर assignments लिख देती थी
और मैंने पूछा तो कहती हाँथो में दर्द है
किसी दूसरे के साथ घंटो रात बात करती थी
और मैं बात करता तो कहती घर से फोन है

किसी दूसरे के बातो से पिघल तू जाती थी
और मैं बात करने आता तो बहाना बना लेती थी
किसी दूसरे के कहने से मुझसे रूठ जाती थी
मैं मनाने आता तो रुख मोड़ लेती थी

किसी दूसरे ने तुझे सिर्फ कुछ पल चाहा
फिर भी वो तेरे लिये तेरा जहाँ बन गया
किसी दूसरे ने मुझसे तुझे छीन लिया
मैं देखता रहा, मेरा मजाक बन गया


Jab Bhi Tu Uske Saath Hoti Hai

अल्फाज मर जाते है
शायद वो अंदर ही घुट जाते है
फासले तेरे मेरे बिछ के
अक्सर बढ़ जाते है
बेकरार मेरी ख्वाइशें
तुझसे बेकिनार होती है
जब भी तू उसके साथ होती है

जीने का मकसद भी
बिछड़ जाता है
बेरहम वक़्त भी
मुझे तन्हा पाता है
तेरे साथ बनायी यादे
मुझे तड़पा ज़ाती है
जब भी तू उसके साथ होती है

छुपा हुआ जख्म
फिर बाहर आता है
वही पुराना दर्द
फिर से नया बन जाता है
यादों और अश्को की महफ़िल
फिर रंग जाती है
जब भी तू उसके साथ होती है


Shayad Majburi Rahi Hogi

शायद मजबूरी रही होगी
जो तुझको मुझ में शामिल कर दिया
तलाश किसी और की थी
लेकिन तुझको हासिल कर दिया

जमाना तुझसे ख़फ़ा था
फिर भी तुझे अपना कर दिया
हर ज़ुबान पे तेरे अफ़साने थे
लेकिन सबको नजरअंदाज कर दिया

बाते झूठी थी और इरादे नापाक
हर हरकत को नाकाम कर दिया
बेहक़ीक़त थी तेरी कहानियों में
सुनके सबको बेदखल कर दिया

कोशिश तुझे बदलनेकी थी
लेकिन तूने मुझे मना कर दिया
इश्क़ तुझसे कभी कर नही पाया
इज़हार-ए-नफरत सरेआम कर दिया


Aaj Mai Phir Khaamosh Tha

आज मै फिर ख़ामोश था
वजह तू थी और तेरे अफ़साने थे
जो मैं पढ़ चूका हु
तेरे साथ बिताये वक़्त में

एक नयी सी उलझन है
के ये तजुर्बा है या तालीम है
जो मैंने पायी है
तेरी हर बात मान के

तू अँधेरी एक रात है
पता नहीं शायद गुफाह है
भूलभुलैया सी भी तू ही है
जिसमे खो गया हूँ फिरसे

तेरी उलझन सी मुस्कान है
वो मुस्कान ही मेरा मस्कन है
हर हरकत में बचपन है
जिनसे नफरत हो गयी अबसे


Written By
Ishwar Sarade, final year student, IT, SKNCOE

For more poetry and shayaris
https://heyishwar.in